Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
कल्पाग्निज्वलनोल्लासपठत्पटपटारवान् ।
आत्मभ्रंशबृहत्क्षोभक्षुब्धाम्बरमहार्णवान् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रलयमण्डल की भयंकर अग्नि की ज्वालाओं के विलासों से विस्पष्टरूप से पट-
पट शब्दकर रहे तथा आत्मा के असली स्वभाव के ध्वंस से (अज्ञान से) उत्पन्न बड़े क्षोभो के सदुश
जलचरों के क्षोभ से क्षुब्ध हुए आकाश रूपी महासमुद्र से युक्त कल्पान्तों को वे परस्पर नहीं
जानते