Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

संनिवेशैर्न नियतैरङ्गानां विविधाङ्गकैः । शिरोभिः सर्वभूतानि परिक्रामन्ति भूमिगैः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, कहीं पर लम्बे-लम्बे प्राणी लम्बे वस्त्रों के सदुश मेघों को बड़े चाव से पहिनते हैं और कहीं पर एक ही वृक्ष के ऊपर प्रत्येक वर्ष में भिन्न-भिन्न जाति के फल लगते हैं ॥४ ३॥ कहीं पर एक जाति के प्राणियों के अंगों की गठन ही अलग-अलग प्रकार की है, कहीं पर एक जाति के प्राणियों के अंग जुदे-जुदे आकार के दिखाई पड़ते हैं, कहीं पर सिर ऊपर की ओर नहीं है, किन्तु भूमितल पर है, इस तरह चित्र-विचित्र प्राणी घूमते दिखाई देते हैं