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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 54

संस्कृत श्लोक

प्राणसंविद्विहीनानि व्यर्थामोदानि कानिचित् । मूकानि शब्दवैयर्थ्याच्छ्रुतिहीनानि कानिचित् ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, कुछ तो प्राणी प्राणेन्द्रिय और इससे होनेवाले गन्धज्ञान से रहित हैं, कुछ निरर्थक ही आमोद-प्रमोद करनेवाले हैं, कुछ शब्देन्द्रिय की शक्ति से रहित होने के कारण मूक हैं और कुछ श्रोत्रेन्द्रिय से रहित हैं