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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

कानिचिद्वर्जितान्येव नेत्रशब्दार्थसंविदा । व्यर्थदीप्तात्मतेजांसि भूतानीत्येकचिन्तया ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर ऐसे प्राणी देखे कि नेत्रशब्द, नेत्ररूप इन्द्रिय और नेत्रजनित रूप आदि का दर्शन ह इन सबसे वे वंचित थे, अतएव उनके लिए सूर्य और चन्द्र आदि के प्रकाश निरर्थक ही रहे । भद्र, इस प्रकार की जो जगत्‌ की रचना है, वह एकाग्रचित्त योगी के मन की कल्पना से मैंने आपसे कही