Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
नेदं ब्रह्मणि नामास्ति जगद्ब्रह्मण्यथ त्विदम् ।
ब्रह्मैवाजमनाद्यन्तं तत्सर्वं तत्पदादिकम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस स्थिति में दृष्टिभेद से ब्रह्म प्रप्रपंच और निष्प्रपंच हो सकता हैं, इस विषय में विरोध हो ही
नहीं सकता, यह कहते हैं /
न तो ब्रह्म में यह जगद्रूप नाम है ओर न उसमें जगद्रूप वस्तु ही है, किन्तु वह सब अन्तिम प्राप्य
तत्पदादिरूप, अज, आदि-अन्तशून्य ब्रह्मरूप ही है