Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 187
एक सौ पचासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छियासीवाँ सर्ग इस सर्ग में "सब कुछ ब्रह्म ही है” यह सिद्धान्त अटल किया जाता है ओर ब्रह्माजी के संकल्प से वर ओर शापो की अर्थसिद्धि अटल की जाती है ।
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- Verse 1पहले कुन्ददन्त द्वारा वर्णित मायाशबल ब्रह्मतत्त्व को दृढ़कर श्रीवस्तिष्ठजी मायारहित शुद्ध…
- Verses 2–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हर्ष की बात है कि इस महात्मा के, शास्त्र के श्रवण से उत्पन्न ज्ञान…
- Verses 4–5शबलब्रह्मनिष्कर्ष-दृष्टि से इसने जो यह वर्णन किया है वह भी उचित ही है, ऐसा कहते हैं। जो ज…
- Verses 6–7जलसे सींची गई लता की तरह सहम्रों शाखाओं को प्राप्त होती है । ब्रह्माण्ड ही परम अणु है, क्…
- Verses 8–9जगत के ही ब्रह्म होने का फल कहते हैं। इसलिए यह समस्त जगत् चिदाकाश, आदिमध्यरहित, अखण्ड, स…
- Verses 10–12यह ब्रह्म जगत्रूप आत्मचिदाकाश में जहाँ जैसा रूप धारण करता है वहाँ अपने स्वरूप को न छोड़ता…
- Verse 13प्रतीयमान देहादि आकृति का कैसे अपलाप करते हैं ? इस शंका पर कहते हैं। जिस प्रकार प्रबोध हो…
- Verse 14संवित् का भी जड़स्थावरता में दृष्टान्त देते हैं । जैसे चेतन स्वरूपवाला (संवित्मय) जन्तु…
- Verse 15चित् के स्थावरभाव की प्राप्ति के अनन्तर जंगमभाव में अभिव्यक्ति में दृष्टान्त देते हैं। ज…
- Verses 16–18जीव की कितने समय तक स्थावरत्व और जगमत्व की स्थिति रहती है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। मोक्ष…
- Verses 19–21वैसा करने पर भी (जीव के प्रति अपने स्थावर ओर जंगम शरीर बनाने पर भी) चित् का भेद नहीं होत…
- Verses 22–23इस प्रकार सृष्टिमात्र की त्रिकाल में असत्ता होने के कारण उसकी आदि और अन्त कल्पना भी मिथ्य…
- Verses 24–25भ्रान्तिवश दिखाई दे रहे सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदि का अस्तित्व नहीं है जैसे चित्रलिखित च…
- Verse 26यद्यपि चिद्घन निद्रारूप अविद्या विभागहीन है तथापि वह सुषुप्तिरूप आवरण से वास्तविक स्वरूपभ…
- Verses 27–29यह प्रलय है, यह सृष्टि है, यह स्वप्न है, यह जाग्रत है ये सब प्रज्ञानघनतारूप सुषुप्तिवाले…
- Verse 30श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, देवता, असुर, मनुष्य आदि स्वरूप चित्त देवता, असुर, मनुष्य…
- Verses 31–32श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, चित्त को आप मनुष्य, देवता, असुर, स्थावर, स्त्री, हाथी, पर्वत,…
- Verses 33–35चित्त के वियुलत्वातिशय को भी अनुभव में आरूढ कराते है। ऊपर की ओर दृष्टि फेंकने पर जो यह सू…
- Verses 36–37हे वत्स, जैसे नदी का धाराप्रवाह नीचे-ऊँचे भूमिभागों को ग्रहण करता है ओर उनका त्याग भी करत…
- Verse 38इस प्रकार सकल जगद्गर्भित मन की परमाणुरूपता ही है, ऐसा कहते हैं। जगत् मे जलान्तर्गत सूर्य…
- Verse 39इस प्रकार जीव ओर जगत् के भेद का भी परिमार्जन हो गया, ऐसा कहते है । जैसे स्वप्नभूमियों मे…
- Verse 40जीव और जगत् का अभेद सिद्ध होने पर जगत् की चिन्मात्रता भी अपने आप सिद्ध हो गई, ऐसा कहते…
- Verse 41जैसे सागररूप एक प्रदेश में एकत्र होकर स्थित हुई ही जलराशि फेन, बुदबुद्, लहर, आवर्त आदि प…
- Verses 42–44उनकी ब्रह्म से अभिन्नता में जलद्रवता का दृष्टान्त देते हैं। जैसे सागर में सागरकुक्षिस्थित…
- Verse 45कैसे शान्त है, कैसे अपने स्वरूप का त्याग नहीं करता है 2 इस आशंका पर कहते है। इन विश्व ओर…
- Verse 46विश्व ओर संवित् में प्रातिभासिक भेद है वास्तव मे तो भेद का अभाव है, ऐसा कहते हैं । स्वप्…
- Verse 47श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, वर ओर शापरूप अर्थ संवित् में कार्यकारणता कैसे हो सकत…
- Verse 48निरावरण ज्ञानवाले भगवान् श्री शंकर और अगस्त्यादि ऋषियों की सत्यसंकल्पअवच्छिन्न चिति ही व…
- Verse 49विधाता की आत्मचिति में समुद्र मेँ जलराशि की तरह जगद्भावों का अकस्मात् भान होता है जो चिद…
- Verses 50–59दीर्घकाल से, अभ्यास से, विचार से, शत्रुमित्र आदि में समदर्शन से, देवता की जाति की सात्विक…
- Verse 60निरावरण ज्ञानवालो की कल्पना वैसी दूसरी कल्पना का उदय होने तक नहीं मिटती, यह कहते है । निर…
- Verse 61निरवयव निरावरण ज्ञानवाले में उससे विपरीत (सावयव और सावरण ज्ञान) वर, शाप आदि कल्पना कैसे र…
- Verse 62तब तो निरावरणज्ञानशून्य केवल उग्र तपर्वियो के वर, शाप आदि मोघ (निष्फल) होगे ? इस आशय से क…
- Verse 63उनके भी वर ओर शाप आदि की सत्यता हो, सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के संकल्प से ही उनकी मोघता…
- Verse 64चूँकि यह प्रजापति ब्रह्मा अपने को ब्रह्म जानता है, इसलिए यह ब्रह्म ही है । जैसे - जल से द…
- Verse 65यह प्रथम प्रजापति जो जो संकल्प करता है शीघ्र वह वैसा ही हो जाता है उसीकी कल्पना यह जगत्…
- Verse 66वह कल्पना कैसी है ? यह वताते है। आधाररहित, निरालम्ब चिदाकाश ही अपने स्वरूप में जगत्रूप से…
- Verse 67उस प्रजापति ने (ब्रह्माने) विविध प्रजा, धर्म, दान, तपस्या, गुण और ज्ञान का उपदेश करनेवाले…
- Verse 68उस प्रजापति ने यह भी कल्पना की कि वेदवेत्ता तपस्वी लोग वादों से अथवा स्वाभाविक वृत्ति से…
- Verse 69इस प्रकार समग्र वस्तुओ के भिन्न-भिन्न स्वभावो की भी उसी ने रचना की है, यह कहते है । इस ब्…
- Verses 70–71इस प्रकार यह सव कल्पना प्रजापतिरूप चिदाकाश की ही रचना है, यह कहते हैं। इस चिदात्मा का ऐसा…
- Verse 72जिस प्रकार संकल्पनगर में शिलानृत्य भी सत्य होता है उसी प्रकार ब्रह्मा के अधिकाररूप प्रारब…
- Verse 73श्रेष्ठ पुरुष के संकल्प से जन्य वरशापआदि को लोग उसके विपरीत संकल्प से क्यो नहीं उलट सकते…
- Verse 74अशुद्ध स्वभाववालों को अस्वतंत्र कल्पनाओं के अभ्यास की दृढ़ता रहती है । इससे भी तद्विरुद्ध…
- Verse 75इसी प्रकार कल्पित त्रिपुटीवेष से स्फुरण होने पर भी चित् का उदासीन साक्षिस्वभाव से भी सर्…
- Verses 76–77साक्षिचैतन्य त्रिपुटी की (दरष्टा, दृश्य और दर्शन की) व्याप्ति के बल से ही उसकी सत्ता का स…
- Verses 78–79पहिले तो बारवार ब्रह्म मे जगत् अध्यस्त है ऐसा कह चुके है अव यह जन्मरहित वियाट् का अगरवर…
- Verse 80जैसे कल्पपर्यन्त एक ही धारा से गिरकर जलकण, जो मन, बुद्धि आदि से रहित हैं, सहस्रो करोड भेद…
- Verse 81केवल इतनी ही विशेषता है कि कणपंक्तियाँ मनोबुद्धिआदि से वर्जित है किन्तु उन ब्रह्मसंविदों…
- Verse 82मनोबुद्धिआदि कल्पना का त्याग होने पर तो जगत् अज्ञानमात्र पर्यवसित होता है, इस आशय से कहत…
- Verses 83–84इस शरीर में मृतावस्था जिस तरह मनोबुद्धि आदि रहित ही अनुभूत होती है, पत्थर आदि में जड़ सत्…
- Verse 85इस प्रकार सृष्टि और प्रलय ये दोनों अज्ञाननिद्रा के अवान्तर भेद हैं, यह कहते हैं । जैसे सु…
- Verse 86चित् में ही जड़ और अजड भेद की कल्पना मेँ भी स्वप्न ही दृष्टान्त है, यह कहते है। जैसे मनु…
- Verse 87चेतन में जाञ्यानुभव की अप्रसिद्धि का वारण करते हैं। जैसे विषयान्तर मे आसक्तिवाले पुरुष के…
- Verse 88ऐसे ही जड़ को भी चेतनभाव का अनुभव प्रसिद्ध है, यह कहते हैं। आकाश, पत्थर, जलादि को जैसे वि…
- Verses 89–90अखण्डकाल मेँ ब्रह्मा के दिनभेदरूप जो कल्प हैं, उनमें जैसे हमारे असंख्य दिन रात्रि की प्रत…