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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 36–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 36,37

संस्कृत श्लोक

तदात्मना स्वयं किंचिच्चेत्यतामिव गच्छति । अगृहीतात्मकं संविदूहामर्शनसूचकम् ॥ ३६ ॥ भाविनामार्थकलनैः किंचिदूहितरूपकम् । आकाशादणु शुद्धं च सर्वस्मिन्भाविबोधनम् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

हे वत्स, जैसे नदी का धाराप्रवाह नीचे-ऊँचे भूमिभागों को ग्रहण करता है ओर उनका त्याग भी करता हे वैसे ही मन विविध शरीरो को ग्रहण करता है ओर उनका त्याग भी करता हे । जैसे यह मरूभूमि है जल नहीं है इस ज्ञान से मरुभूमि में जल की प्रतीति शान्त हो जाती है वैसे ही आत्मा के परिज्ञान से इसकी यह देहादिभरान्ति शीघ्र शान्त हो जाती है