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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 74

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 74

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अशुद्ध स्वभाववालों को अस्वतंत्र कल्पनाओं के अभ्यास की दृढ़ता रहती है । इससे भी तद्विरुद्ध कल्पना की स्वतन्त्रता उनमें नहीं है, इस आशय से कहते है। जिसे जाग्रत्‌काल में “मेँ लोहो की सिकड़ियों से जकड़ा हुआ हूँ” ऐसा दृढ़तर संस्कार है वह जैसे स्वप्न में भी अपने को लोहे की सिकड़ियों मे जकड़ा हुआ देखता है वैसे ही वर्तमान जाग्रत्‌ में भी यह सब सत्‌ है यों बारबार अभ्यस्त को ही संवित्‌ देखती है अनभ्यस्त "यह असत्‌ है” यह नहीं देखती