Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 2–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
सत्स्वसंख्येषु देवेषु सूर्य एवोग्रभाः कथम् ।
दीर्घत्वमथ ह्रस्वत्वं दिवसानां तु किंकृतम् ॥ २ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
काकतालीयवद्भानं यत्परे नियतं स्वतः ।
यथास्थितं यथारूपं स्थिते तज्जगदुच्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हर्ष की बात है कि इस महात्मा के, शास्त्र के
श्रवण से उत्पन्न ज्ञान की पूर्णता हो चुकी है । यह, सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है यह बात हस्तामलकवत्
देखता है। केवल भ्रान्तिमात्र स्वरूप यह विश्व जन्मादिरहित ब्रह्म इसे मालूम होता है, अतः भ्रान्ति भी
इसे शान्त, एक और निर्विकार ब्रह्म ही प्रतीत होती है