Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
एकस्य संविन्मात्रस्य पदार्थशतता तथा ।
यथेदं संविदंशस्य रूपं स्वं स्वमनुज्झतः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
चित् के स्थावरभाव की प्राप्ति के अनन्तर जंगमभाव में अभिव्यक्ति में दृष्टान्त देते हैं।
जैसे सुषुप्तात्मा जीव स्वप्न और जाग्रत् को सैकड़ों जगतों की कल्पनाओं से जाता है वैसे ही चिति
स्थावरत्वरूप जड़ से जंगमस्वरूप चित्त्व को प्राप्त होती है