Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
भविष्यद्रूपसंकल्पनामासौ सकलो गणः ।
संकल्पात्माथ तन्मात्रं गन्धाद्यमनुचेतति ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
निरवयव निरावरण ज्ञानवाले में उससे विपरीत (सावयव और सावरण ज्ञान) वर, शाप आदि
कल्पना कैसे रह सकती है ? इस प्रश्न पर कहते हैं।
अवयवशून्य ब्रह्य मे द्वित्व ओर एकत्व वैसे ही स्थित है जैसे कि सावयव वस्तु में विचित्र अवयवो का
क्रम स्थित रहता हे