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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

संकल्पपूर्वमशकजालवद्धिष्ण्यचक्रकम् । आवर्तवर्तिना भाति चिद्व्योमेदं च दृश्यवत् ॥ २४ ॥ तत्र प्रभास्वराः केचित्केचिदप्यल्पभास्वराः । केचिच्चाभास्वरा भाताः पदार्थाश्चित्ररूपिणः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

भ्रान्तिवश दिखाई दे रहे सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदि का अस्तित्व नहीं है जैसे चित्रलिखित चित्रवधू चित्र से व्यतिरिक्त नहीं है वैसे ही दृश्यमान यह सृष्टि-स्थिति-प्रलयरूप जगत्‌ आत्मा से अन्य नही हें । जैसे चित्रकार द्वारा बनाई जानेवाली चित्रलिखित सेना बुद्धिस्थ चित्र से भिन्न नहीं है वैसे ही मूर्त सर्गता (सृष्टि) भी स्रष्टा की चित्ततादशा में नाना प्रतीत होती हुई भी अनाना ही हे