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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

गगनाङ्गस्य सत्तान्तः शब्दतन्मात्रकल्पया । कुसूलबीजाङ्कुरवत्तिष्ठत्याशान्तरूपिणी ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, देवता, असुर, मनुष्य आदि स्वरूप चित्त देवता, असुर, मनुष्य आदि के भेद से कितना बड़ा है और उसके अवयवो की बनावट कैसी है ? चित्‌ निद्रा कैसी है ओर उसके पेट मेँ जगत्‌ कितना बड़ा ओर कितने समय तक रहता है एवं स्वात्मदर्शन कैसे होता है ?