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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 76–77

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 76–77 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 76,77

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

साक्षिचैतन्य त्रिपुटी की (दरष्टा, दृश्य और दर्शन की) व्याप्ति के बल से ही उसकी सत्ता का सम्पादक है, यह कहते है। एक चित्सत्ता के उपजीवी होने से द्रष्टा ओर दृश्य एक ही है, क्योकि चिदाकाश सर्वव्यापी हे । इसलिए जो-जो इच्छित पदार्थ जहाँ दीखे वह वहाँ सर्वदा सत्‌ ही हे । वायु-शरीरवर्ती स्पन्दन की तरह तथा जलांगवर्तीं द्रवत्व की तरह जैसे ब्रह्म में ब्रह्मत्व अर्थात्‌ जगदाकार से परिणत होने में हेतुभूत मायाशक्तिमत्त्व हे वैसे ही जन्मरहित इस विराट्‌ के अंग से उत्पन्न यह जगत्‌ है