Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 42–44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 42–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 42-44
संस्कृत श्लोक
शून्यरूपा स्वसत्तैका शब्दादिगुणगर्भिणी ।
चिद्भावनाभिसंपन्ना भविष्यदभिधार्थता ॥ ४२ ॥
अहंतोदेति तदनु सह वै कालसत्तया ।
भविष्यदभिधार्थे ते बीजं मुख्यं जगत्स्थितेः ॥ ४३ ॥
चितिशक्तेः परायास्तु स्वसंवेदनमात्रकम् ।
जगज्जालमसद्रूपं चेतनात्सदिव स्थितम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
उनकी ब्रह्म से अभिन्नता में जलद्रवता का दृष्टान्त देते हैं।
जैसे सागर में सागरकुक्षिस्थित जलराशि द्रवरूप से स्फुरित होती है वैसे ही अभिन्न पदार्थ
राशियाँ परमब्रह्म मे स्फुरित होती हैँ । यथास्थित जगद्रूप प्रतिमाओं की अत्यन्त शून्यता को धारण
करनेवाला चित्रूपी यह स्तम्भ अटल होकर खड़ा है, जो आदिअन्तविहीन है । स्वप्नभूमि के तुल्य
संविदाकाश में यथास्थित यह सारा-का-सारा विश्व अपने शान्त निर्मल स्वरूप का त्याग किये
बिना स्थित हे