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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 16–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 16-18

संस्कृत श्लोक

संविन्मये संविदो याः कचन्तीव परे तथा । ताभिस्तेषां स्वदेहानां यासां सा कलना कृता ॥ १६ ॥ चिदुर्वी सलिलं तेजः स्पन्दः शून्यत्वमेव च । प्रत्येकमाकरस्त्वेषां तानि स्वप्न इवाम्बरम् ॥ १७ ॥ तत्र सप्रतिघस्यास्य कठिनस्याकरो महान् । भूपीठं जनताधारो राजव्राजेव राजते ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव की कितने समय तक स्थावरत्व और जगमत्व की स्थिति रहती है ? इस प्रश्न पर कहते हैं। मोक्ष होने तक जीव की यह स्थिति भूमि, जल, वायु, तेज और आकाश में स्वप्नतुल्य आकाशस्वरूप (शून्यरूप) लाखों जगतों के साथ भासती है । जैसे मनुष्य निद्रास्थिति का ग्रहण करता है वैसे ही चिति जड़ता का अपने में आरोप करती है फिर भी उसका चितित्त्व अव्याहत ही रहता है। वह अध्यस्त जड़ता से अपने में जड़ता का आरोप नहीं करती, वास्तव में जड़ता को प्राप्त नहीं होती । जैसे चिति जाड्यवेदनवेत्ता जीव के प्रति स्थावर शरीर बनाती है वैसे ही चिति जाड्यवेदनवेत्ता जीव के प्रति जंगम शरीर भी बनाती हे