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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 85

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 85 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 85

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सृष्टि और प्रलय ये दोनों अज्ञाननिद्रा के अवान्तर भेद हैं, यह कहते हैं । जैसे सुन्दर गाढ़निद्रा में सुषुप्ति और स्वप्न स्थित है वैसे ही सृष्टि और प्रलय के आभास भी ब्रह्म में स्थित हैं ॥८ ४॥ सृष्टि में तो सूर्यादि-प्रकाश वर्तमान है किन्तु प्रलय तो तमोरूप है अतः परस्पर विरूद्ध ये दोनों एक ब्रह्म में कैसे स्थित हैं ? इस शंका का निराकरण करते हैं। जैसे एक ही निद्रा में स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में प्रकाश और अन्धकार का भान होता है वैसे ही परब्रह्म मेँ सर्ग ओर प्रलय का भान भी होता है