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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

इदमित्थमिदं चेत्थं स्वयं ब्रह्मेति भाति यत् । तन्नियत्यभिधं प्रोक्तं सर्गसंहाररूपधृक् ॥ ६ ॥ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्ताख्यं यत्स्वतः कचनं चिति । तत्ततोऽनन्यदेकाच्छं द्रवत्वमिव वारिणि ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जलसे सींची गई लता की तरह सहम्रों शाखाओं को प्राप्त होती है । ब्रह्माण्ड ही परम अणु है, क्योकि वह चिदाकाश के मध्य में स्थित है और परमाणु ही ब्रह्माण्ड है, क्योंकि उसमें सारा जगत्‌ व्याप्त है