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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 33–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 33–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 33-35

संस्कृत श्लोक

यथावयविनो नान्तः सदैवावयवाणवः । नास्तं यान्ति न चोद्यन्ति जगन्त्यात्मपदे तथा ॥ ३३ ॥ ब्रह्म व्योम्नि जगद्व्योम व्योम व्योम्नीव विद्यते । तत्कथं किल संशुद्धमस्तमायात्युदेति वा ॥ ३४ ॥ तस्यानन्तप्रकाशात्मरूपस्याततचिन्मणेः । सत्तामात्रात्मकचनं यदजस्रं स्वभावतः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त के वियुलत्वातिशय को भी अनुभव में आरूढ कराते है। ऊपर की ओर दृष्टि फेंकने पर जो यह सूर्यमार्ग से ऊपर ध्रुव, अन्धकारादि प्रदेश में चाक्षुष ज्ञान जाता है इतने बड़े प्रमाणवाला चित्त है यों उसकी निःसीमता ओर निर्मल आकृति सबके अनुभव से सिद्ध हैँ । यह चित्‌ का उग्र (असहनीय संसारदुःखमय होने के कारण उग्र) रूप है इसी समष्टिस्वरूप चिद्रूप के अन्दर भुवनसमृद्धियाँ जब ब्रह्माण्ड आदि की कल्पना द्वारा आती हैं तब सृष्टि होती है उसे हम लोग चित्त से आई हुई कहते हैं । चित्त को ही ज्ञानी लोग "जीव" जानते हैं, वह आदि अन्तविहीन (व्यापक) है । अतएव वह जैसे आकाश घडो में रहता है वैसे ही सकल देहों में रहता है । व्यष्टिरूप से देह से उत्क्रमण होने के कारण ब्रह्मा की इच्छा से देहों में नहीं भी रहता है