Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 89–90
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 89–90 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 89,90
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अखण्डकाल मेँ ब्रह्मा के दिनभेदरूप जो कल्प हैं, उनमें जैसे
हमारे असंख्य दिन रात्रि की प्रतीति होती है वैसे ही परब्रह्म मेँ असंख्य सृष्टि ओर प्रलय संविदो का
भान होता हे । जिस प्रकार एकमात्र जलस्वभाववाले समुद्र में स्वभाव से ही आवर्तं ओर तरंग वलय
आदि का स्फुरण होता है उसी प्रकार विषयों का दर्शन, उनका मनन, उनका भोगरूप अनुभव और
उनकी एषणा (राग), उनकी प्राप्ति की इच्छा आदि विक्षेपो से निर्मुक्तस्वरूप शान्त परमपद में यह
प्रलय और सृष्टि का पुंज भी स्वभाव से ही भासमान होता हे प्रमाण से तत्त्वदर्शन हो जाने पर वह
स्फुरित नहीं होता