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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 27–29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 27–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 27-29

संस्कृत श्लोक

चिन्मात्रमात्मा सर्वेशः सर्व एवातिदृश्यवत् । नश्यतीव विदेहे स्वे न च भाति न नश्यति ॥ २७ ॥ स्वप्नदर्शनवद्भाति यच्चिद्व्योम चिदम्बरे । चिद्व्योमत्वादृते रूपं तदस्य जगतः कुतः ॥ २८ ॥ यद्यथा स्फुरितं तस्य यावत्सत्तं स्फुरद्वपुः । तत्स्वभावनियत्याख्यैः शब्दैरिह निगद्यते ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह प्रलय है, यह सृष्टि है, यह स्वप्न है, यह जाग्रत है ये सब प्रज्ञानघनतारूप सुषुप्तिवाले आत्मसूर्य के इस तरह के विभिन्न प्रकाश हैं, स्फुरण हैं । उनमें चित्‌ निद्रा का उद्‌भूतवासनावाला जो स्वप्नभाग है वही उपाधिरूप अंश की प्रधानता से चित्त कहा गया है, चिदंश की प्रधानता से जीव हो वही देवता, असुर,मनुष्य आदि अधिकारियों के शरीरों का द्रष्टा होकर तत्त्वज्ञान से चित्‌ निद्रा को हटाकर मुक्त होता है । चौथी ओर पाँचवीं भूमिकाओं में ज्ञात हुआ वही जब छठी भूमिका में स्वयं सुषुप्ति होता है तब सातवीं भूमिका में मुक्ति की अभिलाषा करनेवाले पुरुषों द्वारा "मोक्ष" कहा जाता है