Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
एष तन्मात्रकगणः काकतालीयवत्स्वयम् ।
रूपं येन प्रदेशेन वेत्त्यक्षीति तदुच्यते ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि यह प्रजापति ब्रह्मा अपने को ब्रह्म जानता है, इसलिए यह ब्रह्म ही है । जैसे - जल
से द्रवत्व भिन्न नहीं है वैसे ही यह भी ब्रह्म से भिन्न नहीं हे । श्रुति भी कहती है - तद्यो यो देवानां
प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत्" इत्यादि