Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
संपद्यते तत इदमितीयं रचनेहया ।
कृता सा मुग्धबोधाय मूर्खैर्विरचिता मुधा ॥ ३१ ॥
नास्तमेतीह नोदेति तत्कदाचन किंचन ।
शिलाजठरवच्छान्तमिदं नित्यं सदप्यसत् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, चित्त को आप मनुष्य, देवता, असुर, स्थावर, स्त्री, हाथी,
पर्वत, भूत, प्रेत, पिशाच आदि, पक्षी, कीट, पतंग आदि ओर राक्षस जानिये । उसका प्रमाण भी आप
अनन्त जानिये जहाँ पर परमाणु से लेकर ब्रह्मादिस्थावरात्मक हजारों जगत् समाते हैं