Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 60
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
भविष्यदभिधस्याथ खतः स्वत इवासतः ।
स्वदनं तस्य संघस्य रसतन्मात्रमुच्यते ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
निरावरण ज्ञानवालो की कल्पना वैसी दूसरी कल्पना का उदय होने तक नहीं मिटती, यह कहते है ।
निरावरण ज्ञानवाले ब्रह्मा की जिस कल्पना की पहले जड़ जमी वह आज भी ज्यों-की-त्यों स्थित
है तब तक ज्यों -की- त्यों रहेगी जब तक अन्य कल्पना द्वारा प्रयत्न से परिवर्तित नहीं होगी