Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 50–59
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 50–59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 50-59
संस्कृत श्लोक
चिदेवंव्यवसाया सा जीवशब्देन कथ्यते ।
भाविशब्दार्थजालेन बीजं भूतौघशाखिनः ॥ ५० ॥
चतुर्दशविधं भूतजातमावलिताम्बरम् ।
जगज्जठरकर्णौघं तस्मात्संप्रसरिष्यति ॥ ५१ ॥
असंप्राप्ताभिधाचारा जीवत्वाच्चेतनेन चित् ।
काकतालीयवत्स्पन्दचिन्मात्रं चेतति स्वयम् ॥ ५२ ॥
पवनस्कन्धरूपस्य बीजं त्वक्स्पर्शशाखिनः ।
सर्वभूतक्रियास्पन्दस्तस्मात्संप्रसरिष्यति ॥ ५३ ॥
तत्र यच्चिद्विलासस्य प्रकाशानुभवो भवेत् ।
रूपतन्मात्रकं तद्वद्भविष्यदभिधार्थदम् ॥ ५४ ॥
प्रकाशचेतनं तेजो न तेजोऽन्यकृतं भवेत् ।
स्पर्शसंवेदनं स्पर्शो नेतरस्पर्शसंभवः ॥ ५५ ॥
शब्दसंवेदनं शब्दः स्वत एवानुभूयते ।
खं खेनेव स्वयं कोशे नान्यच्छब्दकृदस्ति हि ॥ ५६ ॥
किल तस्यामवस्थायां कोऽपरः शब्दकृद्भवेत् ।
यथा तथा तदाद्यापि द्वैतैक्यस्यात्यसंभवात् ॥ ५७ ॥
एवं हि रसतन्मात्रं गन्धतन्मात्रमेव च ।
असत्यमेव सदिव स्वप्नाभमिव चेत्यते ॥ ५८ ॥
तेजः सूर्यादिजृम्भाभिर्बीजमालोकशाखिनः ।
तस्माद्रूपविभेदेन संसारः प्रसरिप्यति ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
दीर्घकाल से, अभ्यास से, विचार से, शत्रुमित्र आदि में समदर्शन से, देवता की जाति की सात्विकता
से ओर सात्विक निर्मल स्वरूप से सम्यक् ज्ञानवान् अतएव वास्तविक अर्थ को देखनेवाले ज्ञानी पुरुष
की बुद्धि द्वैत और एेक्य से वर्जित चिन्मात्ररूप होती हे । निरावरण (आवरणरहित) विज्ञानमयी
ब्रह्मरूपिणी चिति का एकमात्र संवित् प्रकाश ही शरीर है उसके अतिरिक्त उसका कोई शरीर नहीं
है । आवरणशून्य विज्ञानवाला पुरुष शान्त अपने आत्मस्फुरणरूप सम्पूर्णं संकल्पमात्र को सकल रूप
से देखता है उस सबको परमार्थं अभिन्न देखता है, यह उसके संकल्प की सत्यता में उपपत्ति हे ।
जैसे हमारा संकल्पनगर संकल्पमात्र है जैसे स्वप्न का शहर संकल्पमात्र हे वैसे ही इस प्रकार के यानी
निरावरण ज्ञानवाले ब्रह्मा का चारों ओर दिखाई दे रहा यह सारा जगत् संकल्पमात्र ही हे । इस प्रकार
दूसरा भी अपने संकल्प में श्रष्ठ निरावरण आत्मा ही यों जैसे जैसे जिसका संकल्प करता है उसके
प्रति वह वैसा वैसा होता है । जैसे बालक संकल्प-नगर में शिला ओं के उड़ाने का, जिसमें स्वाधीन
नियन्त्रण है, अनुभव कर शीघ्र ही उसे सत्य समझता है वैसे ही हिरण्यगभीदि निरावरणात्मा में भी
अपने संकल्परूप इस त्रिजगत् मेँ वर, शाप आदि को अपने से अभिन्न सत्य जानता हे । जैसे
संकल्पनगर मेँ अपनी कल्पना से बालू से तेल निकलता है वैसे ही यहाँ पर ब्रह्मा के संकल्परूप जगत्
में सृष्टि के संकल्पो से कल्पनावश हिरण्यगभादि आत्मा से वर, शाप आदि अर्थ की बिना उपादान
कारण के सिद्धि होती हे । जिसके ज्ञान का आवरण नहीं हटा उसकी भेदबुद्धि शान्त नहीं होती, इसलिए
द्वित के संकल्प से उस अज्ञानी के वर, शाप आदि अर्थ सिद्ध नहीं होते