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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verses 10–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verses 10–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 10-12

संस्कृत श्लोक

सर्गोऽयमिति तद्बुद्धं क्षणं यत्कचनं चितः । कल्पोऽयमिति तद्बुद्धं क्षणं तत्कचनं चितः ॥ १० ॥ तत्कालस्तत्क्रिया तत्त्वं देशद्रव्योदयादि तत् । यत्स्वप्न इव चिन्मात्रकचनं स्वस्वभावतः ॥ ११ ॥ रूपालोकमनस्कारदेशकालक्रियादि तत् । चित्त्वं कचति चिद्व्योम्नि यन्नामानाकृति स्वतः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह ब्रह्म जगत्रूप आत्मचिदाकाश में जहाँ जैसा रूप धारण करता है वहाँ अपने स्वरूप को न छोड़ता हुआ वैसा ही हो जाता हे । ब्रह्म अपनी माया से दृश्यजगत्रूप में उत्पन्न हुआ इससे ब्रह्म ओर जगत्‌ यों देत की सिद्धि नहीं समझनी चाहिये, क्योकि वह तो यथावत्‌ अविकृत ही है। शून्यत्व और आकाश की तरह ब्रह्म और जगत्‌-इन दोनों को एक ही समझो । दृश्य जगत्‌ ही परम ब्रह्म है और परम ब्रह्म ही दृश्यता है । यह न तो शान्त है, न अशान्त है, न आकृतिविहीन है और न आकृतिवाला ही है