Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 75
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 75
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार कल्पित त्रिपुटीवेष से स्फुरण होने पर भी चित् का उदासीन साक्षिस्वभाव से भी सर्वदा
स्फुरण होता ही है, यह कहते हैं।
चिदाकाश चिदाकाश मेँ स्फुरित हो रहे एक इस अपने द्रष्टादुश्यात्मक स्वरूप को देखता हुआ
सर्वदा प्रकाशित होता हे । वह उससे भिन्न नहीं है