Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
विचित्राणामसंख्यानां भावानां नियतिः कुतः ।
कथं स्वभावो भावानामेकरूपः स्थितोऽचलः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले कुन्ददन्त द्वारा वर्णित मायाशबल ब्रह्मतत्त्व को दृढ़कर श्रीवस्तिष्ठजी मायारहित शुद्ध ब्रह्म
का वर्णन करने के लिए प्रवृत्त हुए, ऐसा कहते है।
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : कुन्ददन्त के यों कहने पर परम श्लाघनीय भगवान् श्रीवसिष्ठ मुनिजी ने
यह परमार्थोचित वचन कहा
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पचासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छियासीवाँ सर्ग इस सर्ग में "सब कुछ ब्रह्म ही है” यह सिद्धान्त अटल किया जाता है ओर ब्रह्माजी के संकल्प से वर ओर शापो की अर्थसिद्धि अटल की जाती है ।