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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 187, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 187 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

भाविनामार्थरूपं तद्बीजं शब्दौघशाखिनः । पदवाक्यप्रमाणाढ्यवेदार्थादिविकारि च ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

निरावरण ज्ञानवाले भगवान्‌ श्री शंकर और अगस्त्यादि ऋषियों की सत्यसंकल्पअवच्छिन्न चिति ही वहाँ पर देव और सर्प के शरीररूप से विवर्तत होती है, इसलिए विवर्तवाद में इस आक्षेप का अवकाश ही नही हैं, यों उत्तर देने के लिए श्रीवसिष्ठजी भूमिका बोधिते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे सागर मे जलराशि का स्फुरण होने पर आवर्तगति होती हे वैसे ही अत्यन्त अवदात (निर्मल) यानी तत्त्वज्ञान से खूब विमृष्ट होने के कारण अत्यन्त निर्मल चिदाकाश का सत्यसंकल्पानुसारी जो स्फुरण है वही जगत्‌ कहा जाता हे, यह बात मैं अनेक बार कह आया हूँ