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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 33

60 verse-groups

  1. Verse 1बत्तीसवाँ सर्गे समाप्त तैंतीसवाँ सर्ग शुभ उद्यम, साधु और सत्शास्त्र के माहात्म्य का वर्णन…
  2. Verse 2शास्त्र प्रतिपादित शुभ उद्यम का असाध्य तो कुछ भी नहीं है, यह दशनि के लिए नन्दीश्वरोपाख्या…
  3. Verse 3सेना और धन-धान्य से सम्पन्न बलि आदि दानवं द्वारा जैसे हाथियों द्वारा कमल के सरोवर कुचले ज…
  4. Verse 4राजा मरुत्त के यज्ञ में संवर्तनामक महर्षि ने ब्रह्मा की तरह सुर और असुरो से पूर्ण दूसरी स…
  5. Verse 5शास्त्रीय महान शुभ उद्योग से युक्त विश्वामित्रजी ने बार-बार की गई कठोर तपस्या से दुष्प्रा…
  6. Verse 6प्रकार के भाग्यहीन उपमन्यु ने भी तपस्या से प्रसन्न हुए भगवान शंकर के प्रसाद से क्षीरसागर…
  7. Verse 7तीनों लोकों मे महाबली रूप से विख्यात विष्णु, ब्रह्मा आदि देवाधिदेवो को भी तृण की नाई निगल…
  8. Verse 8राजकुमारी सावित्री ने पति के प्राणों का अनुगमन तथा स्तुति आदिरूप से प्रसन्नता के उपाय से…
  9. Verse 9इस लोक मे ऐसा कोई शास्त्रीय सुखद्योग का उत्कर्ष नहीं हे, जिसका स्फुट फल हो । शंका : विविध…
  10. Verse 10आत्मज्ञान सम्पूर्ण सुख-दुःख, जन्ममरण आदि अवस्थाओं की भ्रमदृष्टियों का मूलोच्छेद करनेवाला…
  11. Verse 11पहले भोग, राग आदि की द्रष्टियों के विनाश के लिए तत्‌ तत्‌ विषयों में तो, दृष्टयो का अन्वे…
  12. Verse 12यदि कोई कहे, सम्पूर्ण विषय के दुःखपूर्वक त्याग का भी अंगीकार करके वैराग्य से राग आदि दोष…
  13. Verse 13अब शम का उपाय कहते है । अभिमान का त्याग कर, स्थिर शम का अवलम्बन कर और बुद्धि से मोक्ष के…
  14. Verse 14चित्तशुद्धि के लिए किये गये तप आदि भी संत-साधुओं की सेवा द्वारा ही ज्ञानोपयोगी होते हैं,…
  15. Verse 15सज्जन का लक्षण कहते हैं। जिसके सेवन से प्रतिदिन लोभ, मोह और क्रोध क्षीण होते हैं और जो अप…
  16. Verse 16सदा सज्जन की सेवा में तत्पर पुरुष की कभी आत्मज्ञानी के साथ भी अवश्य संगति हो जाती है, जिस…
  17. Verse 17उससे इसकी पुरुषार्थसिदि भी होती है, ऐसा कहते हैं। दृश्य के अत्यन्त अभाव से तो एकमात्र परब…
  18. Verse 18पर्रह्म ही केवल अवशिष्ट रहता है, ऐसा जो पहले कहा, उसका दृश्य के अत्यन्त अभाव की उपपत्ति द…
  19. Verses 19–20जैसे इस जगत के उत्पत्ति आदि नहीं हो सकते वैसे उत्पत्ति प्रकरण में भी अनेक युक्‍्तियों द्व…
  20. Verse 21यदि यह जगत उत्पन्न नहीं हुआ तो जगत नाम से सबको इसका बोध कैसे होता है ? इस पर कहते हैं। नि…
  21. Verse 22यदि को शंका करे कि जगत्‌बोधरूपी चैतन्य सविकल्प है और ब्रह्मचैतन्य निर्विकल्प है, इस तरह ज…
  22. Verse 23इस निर्विकल्पक चिद्‌वृत्ति का यानी चरम साक्षात्कार का जो उन्मेष है, वही जगत के अनुभव का अ…
  23. Verse 24इसलिए निमेष ही प्रत्यगात्मा का अविद्यारूपी मल है और उन्मेष निर्मलतारूपी मोक्ष है, इस आशय…
  24. Verse 25यदि कोई शंका करे कि अहमर्थ अहंकार है, वह परिज्ञात होकर भी कैसे चिदाकाश होगा ? तो इस पर कह…
  25. Verse 26दृश्य अहमादि जगत वस्तुतः है ही नहीं यानी बाधित है। शंका : परिज्ञात होने पर अहमादि जगत का…
  26. Verse 27निर्मल बुद्धिवाले पुरुषों की अपिशाच में पिशाच बुद्धि बाधित हो जाती है । किन्तु जिनकी बुद्…
  27. Verse 28जैसे बालकों का मोह ज्ञान का बाधक होता है वैसे ही प्रौढ पुरुषो का अभिमान भी ज्ञान निवर्तक…
  28. Verse 29अहं इस अभिमान का विनाश होने पर भय, राग और मुमुक्षु से होनेवाले द्वेष ओर राग के विषयभूत नर…
  29. Verses 30–32जब तक हृदय में अन्धकाररूपी घनघटा आटोप के साथ विराजमान रहती है तभी तक तृष्णारूपी कुटज की म…
  30. Verses 33–34ज्ञान का आवरण कर अहंकाररूपी मेघ के सदा स्थित रहने पर अज्ञान की ही जड जमती हे, ज्ञानालोक क…
  31. Verses 35–36यह देह मैं हूँ, इस प्रकार का भ्रम सम्पूर्ण अनर्थो की जड़ है ऐसा कहते हैं । यह देह मैं हूँ…
  32. Verse 37जिस पुरुष ने अहंकाररूपी दुष्ट वृक्ष के अंकुर को विचार से संस्कृत मनरूपी हल से जोतकर उखाड़…
  33. Verse 38वासना आदि पदार्थ बड़े ध्यान से सुनने योग्य शब्दवाले सेमल के पके हुए फलों के तुल्य कौओं के…
  34. Verses 39–40वस्तुतः आत्मा अहंभाव से वर्जित ही है, पर आत्मा का तिरोभाव करनेवाली अहंभावना से वह स्वयं ह…
  35. Verse 41जिस अधम पुरुष को अहंकाररूपी पिशाच ने चंगुल में फसा लिया, उसके अंहाकाररूप पिशाच को निवृत्त…
  36. Verses 42–43श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, किस उपाय से अहंकार नहीं बढ़ता ? हे ब्रह्मन्‌ संसाररूप…
  37. Verse 44श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त आत्मस्वभाव के सदा स्मरण से आत्मा को च…
  38. Verse 45जिन पुरुष की आत्मा में अहंकार नहीं है और दृश्य शोभाएँ भी नहीं है ऐसी स्थिति से स्वयं ही न…
  39. Verse 46अन्दर “अहं” बाहर जगत यों हेय-उपादेय की निमित्तभूत दृष्टियों का क्षय होने पर अविषमतारूप प्…
  40. Verse 47मैं यानी द्रष्टा, चित्‌ यानी दर्शन और जगत यानी दृश्य इस त्रिपुटी ज्ञान के, उसमें भी यह शत…
  41. Verse 48श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे प्रभो, इस अहंकार का क्या आकार है और कैसे देहमात्र में अहंभावर…
  42. Verse 49श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस त्रिलोकी में तीन प्रकार के अहंकार हैं, उनमें…
  43. Verses 50–52“मैं यह सब विश्व हूँ”, इस प्रकार कार्यब्रह्मविषयक तथा “मैं कभी च्युत न होनेवाला परमात्मा…
  44. Verses 53–54जो लोग सप्तम भूमिका में स्थित हैं, उनमें अहंकार के बिना जीवन की अनुपपत्ति होने से अहंकार…
  45. Verse 55विविध प्रकार की मानसिक दुश्चिन्ता आदि दुःख देनेवाले इस बलवान शत्रु से आहत हुआ जीव अपरिच्छ…
  46. Verse 56स्वभाव से ही चिरकाल से पीछे पड़ी हुई इस दुष्ट अहंकृति से दुर्वासना ओं द्वारा दुष्कर्मो मे…
  47. Verse 57किससे फिर जन्तु मुक्त होता है ? इस पर कहते हैं। अवशिष्ट पूर्वोक्त शुद्ध अहंकारो से युक्त…
  48. Verse 58यही प्रणाली अन्य ब्रह्मनिष्ठ पुरूषो के भी अभिमत है, ऐसा कहते है । देहात्मभावरूप अहंकार की…
  49. Verse 59उक्त सिद्धान्त का ही फिर अनुवाद कर उपसंहार करते है । देहात्मभावरूप अहंकार की तरह बद्धमूल…
  50. Verse 60उसमें पूर्वोक्त उपाख्यान का भी दृष्टान्तरूप से उल्लेख करते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, इस दु…
  51. Verse 61श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्‌, इस तीसरे लौकिक अहंकार को चित्त से हटाकर किस प्रकार की…
  52. Verse 62श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यह तीसरा अहंकार त्यागने योग्य है, दुःख देनेवाले…
  53. Verse 63इसी बात को विशद करते हैं। हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त प्रथम इन दो अहंकार दृष्टि…
  54. Verse 64तदनन्तर उन दो अहंकारों का भी त्याग करके सब अहंकारों से रहित होकर यदि स्थित रहे, तो वह अति…
  55. Verses 65–66पथ्य वचन सैकड़ों बार कहना चाहिए, इस न्याय से फिर देहात्मभावना के त्याग के गुणों को कहते ह…
  56. Verse 67विचार से इस स्थूल लौकिक अहंकार का त्याग करके पुरुष चाहे चुपचाप बैठा रहे या लौकिक व्यवहार…
  57. Verse 68हे महामति श्रीरामचन्द्रजी, जिस पुरुष का अहंकार नष्ट हो गया, उसको भोगरूपी रोग इस प्रकार स्…
  58. Verse 69भोगों के स्वाद न देने पर परम कल्याण पुरूष के सामने स्थित-सा हो जाता है, क्योकि उसके प्रति…
  59. Verse 70हे श्रीरामचन्द्रजी, अहंकार के स्मरण के त्याग से, धैर्य से ओर श्रवण आदि प्रयत्न से संसाररू…
  60. Verse 71महात्मा पुरुष पहले सबमैं ही हूँ, ये सभी मेरे हैं, ऐसा समझ कर तदनन्तर देहादि मैं नहीं हूँ,…