Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
मिथ्येयमिन्द्रजालश्रीः किं मे स्नेहविरागयोः ।
इत्यन्तरानुसंधानादहंकारो न जायते ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे
श्रीरामचन्द्रजी, पूर्वोक्त आत्मस्वभाव के सदा स्मरण से आत्मा को चिन्मात्र दर्पण की तरह निर्मल रखने
पर अहंकार नहीं बढ़ता ॥ ४ ३॥ यह जगत रूपी इन्द्रजाल मिथ्या है मुझे इसमें स्नेह और वैराग्य से क्या
प्रयोजन है, ऐसा मन में ध्यान करने से अहंकार उत्पन्न नहीं होता