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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

न तपांसि न तीर्थानि न शास्त्राणि जयन्ति च । संसारसागरोत्तारे सज्जनासेवनं विना ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्तशुद्धि के लिए किये गये तप आदि भी संत-साधुओं की सेवा द्वारा ही ज्ञानोपयोगी होते हैं, स्वतन्त्ररूप से ज्ञानोपयोगी नहीं होते हैं, इस आशय से कहते हैं। संसाररूप सागर को पार करने के लिए सज्जन की सेवा के बिना न तो तप ज्ञानप्राप्ति के लिए समर्थ होते हैं, न तीर्थसेवन ज्ञानजनक होते हैं और न शास्त्राभ्यास ही ज्ञान उत्पन्न करा सकते हैं