Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अहंभावोऽङ्कुरो जन्म वृक्षाणामक्षयात्मनाम् ।
ममेदमिति विस्तीर्णास्तेषां शाखाः सहस्रशः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस पुरुष ने अहंकाररूपी दुष्ट वृक्ष के अंकुर को विचार से संस्कृत
मनरूपी हल से जोतकर उखाड़कर फेंक दिया, उसके आत्मारूपी खेत में संसार का विनाश करनेवाला
सैकड़ों शाखाओं से युक्त अतएव दुरुच्छेद्य ज्ञानरूपी सस्य (वृक्षों का फल) वृद्धि को प्राप्त होकर
फलता है ॥३ ६॥ अहंकार ज्ञानरूपी कुठार के बिना कभी नष्ट न होनेवाले जन्मरूपी वृक्षों का अंकुर है
और “यह मेरा है", यह उनकी हजारों बड़ी-बड़ी शाखाएँ है