Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
त्रिविधो राघवास्तीह त्वहंकारो जगत्त्रये ।
द्वौ श्रेष्ठावितरस्त्याज्यः श्रृणु त्वं कथयामि ते ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस त्रिलोकी में तीन प्रकार के
अहंकार हैं, उनमें शास्त्रीय दो अहंकार यानी सूक्ष्मात्मविषयक और सर्वात्मविषयक अहंकार श्रेष्ठ हैं
और तीसरा अशास्त्रीय अहंकार त्याज्य है, आप सुनिये, मैं उन्हें आपसे कहता हूँ