Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
मित्रस्वजनबन्धूनां नन्दिनानन्ददायिना ।
सरसीशानमासाद्य मृत्युरप्युपनिर्जितः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
शास्त्र प्रतिपादित शुभ उद्यम का असाध्य तो कुछ भी नहीं है, यह दशनि के लिए नन्दीश्वरोपाख्यान
आदि का संक्षेप से उल्लेख करते हैं।
इष्ट-मित्र ओर आत्मीय बन्धु-बान्धवों को आनन्द देनेवाले नन्दी ने तालाब के किनारे शिवजी
को आराधना द्वारा प्राप्त करके मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की थी (=>)