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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

अहं चिज्जगदित्यन्तर्हेयादेयदृशोः क्षये । समतायां प्रसन्नायां नाहंभावः प्रवर्धते ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं यानी द्रष्टा, चित्‌ यानी दर्शन और जगत यानी दृश्य इस त्रिपुटी ज्ञान के, उसमें भी यह शत्रुभूत है यह मित्रभूत है इस सृष्टि के, क्षीण होने पर सर्वात्मकतारूप समता के सिद्ध होने पर अहंभाव नहीं बढ़ता