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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 71

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 71

संस्कृत श्लोक

नाहं न तेन मम किंचिदपीति मत्वा सर्वं च मे सकलमप्यहमेव चेति । लब्धास्पदं मनसि संविदमेवमीड्यां नीत्वा स्थितिं परमुपैति पदं महात्मा ॥ ७१ ॥

हिन्दी अर्थ

महात्मा पुरुष पहले सबमैं ही हूँ, ये सभी मेरे हैं, ऐसा समझ कर तदनन्तर देहादि मैं नहीं हूँ, देह के सम्बन्धी कुछ भी मेरे नहीं है, ऐसा विचार कर उससे सब प्रतिबन्धकों का नाश होने से प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए, परम श्लाघनीय, पहले विस्तारपूर्वक कहे गये आत्मज्ञान को मन में प्राप्त होकर, क्रम से सात भूमिकाओं में स्थित होकर, अपरिच्छिन्न आत्मा स्वयं होकर विदेह कैवल्यरूप परमपद को प्राप्त होता हे