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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 39–40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 39,40

संस्कृत श्लोक

अहंभावनया भाति त्वमहंभाववर्जितः । संसारचक्रवहनमात्मनः परिरोधया ॥ ३९ ॥ अहंभावतमो यावज्जन्मारण्ये विजृम्भते । तावदेता विवल्गन्ति चिन्तामत्ताः पिशाचिकाः ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

वस्तुतः आत्मा अहंभाव से वर्जित ही है, पर आत्मा का तिरोभाव करनेवाली अहंभावना से वह स्वयं ही संसाररूपी चक्र में भ्रमण को प्राप्त हुआ-सा प्रतीत होता है। जब तक जन्मरूपी अरण्य में अहंकारूपी अन्धकार अपना सिक्का जमाये रहता है तब तक चिन्तारूपी मत्त पिशाचिकाएँ इधर उधर दौड़ती रहती हैं