Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
यत्किंचिदिदमायाति सुखदुःखमलं भवे ।
तदहंकारचक्रस्य प्रविकारो विजृम्भते ॥ ३५ ॥
अहंकाराङ्कुरः कृष्टो हृदयेनावरोपितः ।
सहस्रशाखं दुश्छेदं तस्य संसृतिनाशनम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह देह मैं हूँ, इस प्रकार का भ्रम सम्पूर्ण अनर्थो की जड़ है ऐसा कहते हैं ।
यह देह मैं हूँ, इस प्रकार के प्रबल अज्ञान से बढ़कर अनर्थकारी दूसरा अज्ञान न इस संसार में हुआ
और न होगा ॥ ३ ४॥ इस संसार में जो कुछ भी सुख-दुःखरूपी विकार प्राप्त होता है, वह अहंकाररूपी
चक्र का मुख्य विकार है