Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
चिज्ज्योत्स्ना यावदेवान्तरहंकारघनावृता ।
विकासयति नो तावत्परमार्थकुमुद्वतीम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बालकों का मोह ज्ञान का बाधक होता है वैसे ही प्रौढ पुरुषो का अभिमान भी ज्ञान निवर्तक है,
इस आशय से कहते है।
जब तक अन्तःकरण मेँ चैतन्यरूपी चाँदनी अहंकाररूपी मेघ से आवृत रहती है तब तक वह
परमार्थरूपी कुमुदिनी को विकसित नहीं करती