Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verses 50–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verses 50–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 50-52

संस्कृत श्लोक

अहं सर्वमिदं विश्वं परमात्माहमच्युतः । नान्यदस्तीति परमा विज्ञेया सा ह्यहंकृतिः ॥ ५० ॥ मोक्षायैषा न बन्धाय जीवन्मुक्तस्य विद्यते । सर्वस्माद्व्यतिरिक्तोऽहं बालाग्रशतकल्पितः ॥ ५१ ॥ इति या संविदेषासौ द्वितीयाहंकृतिः शुभा । मोक्षायैषा न बन्धाय जीवन्मुक्तस्य विद्यते ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

“मैं यह सब विश्व हूँ”, इस प्रकार कार्यब्रह्मविषयक तथा “मैं कभी च्युत न होनेवाला परमात्मा हूँ“, इस प्रकार कारणब्रह्मविषयक अथवा तत्पद के वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ विषयक अहं से अतिरिक्त जगत में कुछ नहीं है, इस प्रकार का जो अहंकार है, उसे आप परम अहंकार जानिये । ये अहंकार जीवन्मुक्तपुरुष की मोक्षप्राप्ति के लिए हैं, बन्धन के लिए नहीं है। बाल के अग्रभाग का सौवाँ हिस्सा बनाया गया यानी शोधन द्वारा निरवयव किया गया मैं सबसे अतिरिक्त हूँ, इस प्रकार की जो बुद्धि है, वह दूसरा शुभ अहंकार है। वह भी छठी भूमिका में स्थित पुरुष के मोक्ष के लिए ही है, बन्धन के लिए नहीं है