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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 58

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

न देहोऽस्मीति निर्णीय वर्जनं महतां मतम् । प्रथमं द्वावहंकारावङ्गीकृत्यान्त्यलौकिकौ ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

यही प्रणाली अन्य ब्रह्मनिष्ठ पुरूषो के भी अभिमत है, ऐसा कहते है । देहात्मभावरूप अहंकार की तरह बद्धमूल हुए पूर्वोक्त दो अहंकारो को पहले स्वीकार कर “मेँ देह नहीं हूँ" यों विचार से भी निश्चय कर देह में आत्मभावरूप अहंकार का त्याग करना चाहिये, ऐसा प्राचीन महापुरुषों का मत है