Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
अहं हि जगदित्यन्तर्हेयादेयदृशोः क्षये ।
समतायां प्रसन्नायां नाहंभावः प्रवर्धते ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्दर “अहं” बाहर जगत यों हेय-उपादेय की निमित्तभूत दृष्टियों का क्षय होने पर
अविषमतारूप प्रसन्नता के प्राप्त होने पर अहंभाव नहीं बढ़ता