Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 53
बावनवाँ सर्ग समाप्त तिरपनवाँ सर्ग॑ अहंकार का त्याग, संगत्याग आदि का लक्षण ओर दशाओं के भेद से व्यवस्थित उपास्य और ज्ञेय का स्वरूप-इन सबका वर्णन ।
62 verse-groups
- Verse 1"अपने बन्धुओं को मारनेवाला मेँ हूँ" इस प्रकार का अहन्ताभिमान तथा “ये मेरे ही बान्धव हैः इ…
- Verse 2अभिमान-त्याग का फल कहते हैं। वधादिप्रवृत्तिकाल में जिस पुरुष में “मे इसे मारता हूँ” यों अ…
- Verse 3हन्तृत्वादि धर्मवाले देहादि में तादात्म्य-भ्रम होने से ही देह के धर्म हन्तृत्वादिका आत्मा…
- Verse 4हे भारत, इसी बुद्धिवृत्ति के कारण 'मैं हन्तृत्वादि धर्मों से युक्त हू, “ “हन्तृत्वादिप्रय…
- Verse 5अंशो के सदुश स्वात्मा के परिच्छेदक होने के कारण अंशरूप देह, इन्द्रिय आदि जो सत्त्वादि गुण…
- Verse 6विचार करने पर तो रूपादि विषयों में आँख आदि इन्द्रियो की ही प्रवृत्ति है, न कि आत्मा की ।…
- Verse 7इस मन आदि अन्तःकरण संघात के संकल्पादिरूप अपने कार्य में तत्पर रहने पर भी "उसमें मेँ कोई न…
- Verse 8किसी जनसमुदाय द्वारा कोई एक कार्य किया गया हो, वहाँ पर उस समुदाय का हर एक पुरुष अपने में…
- Verse 9(॥70) निरहंकारी पुरुष का फल की अभिलाषा से रहित, कायिक, वाचिक और मानसिक कर्म चित्तशुद्धि द…
- Verse 10जिसका शरीर अहन्तारूपी विषचूर्ण से मारण के लिए व्यापारित नहीं हुआ है, यानी बारबार मरण के ह…
- Verse 11प्राज्ञ होने पर भी, अतिबहुज्ञानी होने पर भी दुष्ट प्रकृति पुरुष जैसे कहीं (लौकिक या शास्त…
- Verse 12जो ममतारहित, अहंकार से शून्य, सुख और दुःख होने पर हर्ष-विषाद से रहित तथा क्षमावान्, है व…
- Verse 13हे पाण्डुपुत्र, तुम्हारा यह उत्तम क्षात्र कर्म यानी क्षत्रियो के लिए शास्त्रविहित युद्ध म…
- Verse 14तब तो बन्धुवध से अतिरिक्त द्रोण, भीष्म, कृपाचार्य आदि गुरुजन का वधरूप जो कुत्सित कर्म है,…
- Verse 15जब अज्ञानी का भी स्वधर्म श्रेय के लिए है, तब तत्त्वज्ञानी को स्वधर्म से नरकादि-प्रसक्तितो…
- Verse 16राज्यलाभ आदि लोभप्रयुक्त युद्ध मे "लोभमूलानि पापानि रसमूलास्तथा मयाः“ इस न्याय से कदाचित्…
- Verse 17अथवा ब्रह्मार्पणबुद्धि से, जिसका लक्षण आगे चलकर किया जायेगा, सम्पादित हुआ वह शास्त्रीय कर…
- Verse 18निर्विशेष ब्रह्मतत्त्व के ज्ञान से अथवा उसकी असामर्थ्य में (निर्विशेष ब्रह्म के तत्त्वज्ञ…
- Verse 19अथवा, सर्वसंकल्पत्यागरूपी सन्यास योग में आत्मा को लगा देने से भी तुम्हें कर्मबन्धन की प्र…
- Verses 20–21इस तरह उपदेश प्राप्त कर चुके अर्जुन, तत्-तत् लक्षणों से संग और त्याग आदिका विभाग जानने…
- Verse 22तत्त्वपरिज्ञान के बिना आत्यन्तिक संगत्याग नहीं हो सकता, इसलिए भगवान् श्री कृष्णचन्द्रजी…
- Verse 23ब्रह्माकार से परिपूर्ण चित्त की वृत्ति को, जो कि अज्ञान की निवृत्तिरूप फल से उपहित है, पर…
- Verse 24ब्रह्म मे जगत् और अहंकार - इन दोनों के बाध की उपयन्ति के लिए उसमें अध्यस्तता कहने के लिए…
- Verse 25तादृश्यभाव ब्रह्म से कुछ दूसरे रूप से उदित जो कुछ थोडा-सा समुत्थान है, वही यह जगत् का प्…
- Verse 26संन्यास-वर्णन की उपपत्ति के लिए ब्रह्म मे जगदारोप के समान ही ब्रह्म के अंशभूत प्रत्येक जी…
- Verse 27“मैं ' इस प्रकार का यह अहंभाव अपने अधिष्ठानस्वरूप ब्रह्म से वास्तव में भिन्न है ही नहीं,…
- Verse 28अहन्ता के विषय में कहा गया न्याय घटादि विषयों में होनेवाले ममताभाव में भी लगाना चाहिए, यह…
- Verse 29जब तत्-तत् विषयों की विचित्रता से चित्र-विचित्र होकर अहं तथा ममतादि स्वरूप सम्पूर्ण विक…
- Verse 30उक्त रीति से विचारकर सार ओर असार के विभाग का ज्ञान प्राप्त कर चुके पुरुष की बुद्धि में अह…
- Verses 31–32और उससे सव संकल्पो का त्यागरूप असग सिद्ध होता है यह प्रथम प्रश्न का भी उत्तर हो चुका, यह…
- Verse 33इस चिदात्मा में अज्ञान के कारण इन जीव, जगत् आदि का नाम से ही भेद है, परमार्थतः यह नामरूप…
- Verse 34यों दो रूपोंवाले मुझमें अधिकार के तारतम्य से अपना मन लगाकर स्थित रहो, तादृश स्वरूपवाले मु…
- Verse 35यों भगवान् से कहे गये अर्जुन : उन दोनों रूपों की, उनकी प्राप्ति के लिए योग्य अधिकार की औ…
- Verses 36–37श्रीभगवान् ने कहा : हे पापशून्य अर्जुन, यह जान लो कि मेरे दो रूप हैं - एक तो सामान्य रूप…
- Verse 38पार्थ, जब तक तुम अप्रबुद्ध होकर अनात्मज्ञरूप से स्थित हो तब तक तो चतुर्भुजाकार देव की पूज…
- Verse 39तदनन्तर तुम चित्तशुद्धिक्रम से संप्रबुद्ध होकर परम उत्कृष्ट, आदि और अन्त से रहित मेरे उस…
- Verse 40हे अरिमर्दन, यह सगुण देव का भजन मैंने तुमसे चित्तशुद्धि के अभाव की संभावना करके ही कहा है…
- Verse 41मैं दिशास्वरूप हूँ” मेँ जगद्रूप हूँ" इत्यादि विभूतियों के उपदेश का भी उन -उन पदार्थों के…
- Verse 42मेरे उपदेश के ज्ञान से तत्काल ही अपने स्वरूप में तुम्हें विश्रान्ति प्राप्त हो जायेगी, यो…
- Verse 43पार्थ, योग से युक्त अन्तःकरणवाले ओर चिरकाल के योगाभ्यास से सर्वत्र सन्मात्र का साक्षात्का…
- Verse 44जो ब्रह्मज्ञ “सव वह ब्रह्म ही है" यों ऐक्य का आश्रय कर सम्पूर्ण भूतों में स्थित आत्मा को…
- Verse 45स्वयं ही "सर्वभूतस्थमात्मानम् इस श्लोक के तात्पर्य का वर्णन करते है । हे अर्जुन, सर्वशब्…
- Verse 46किसी के द्वारा अनुभूत न होने से उस आत्मा में प्रसक्त हुई अत्यंत परोक्षता का निवारण करते ह…
- Verse 47हे भारत, तीनों लोकों में स्थित जलों के भीतर जो रसानुभव विद्यमान है, गऊ के विकारस्वरूप दूध…
- Verse 48सम्पूर्ण शरीरों के भीतर विषय समूहों से निर्मुक्त, अतएव सूक्ष्मरूप से जो अनुभव स्थित है, व…
- Verse 49जिस प्रकार सम्पूर्ण दूधों के भीतर घी स्थित ही है, उसी प्रकार सम्पूर्ण पदार्थों के भीतर अध…
- Verse 50दृष्टान्तों द्वारा आत्मा की देह के अन्दर स्थिति का विशवरूप से वर्णन करते हैं। जैसे समुद्र…
- Verse 51-असंस्थित इव' इस कथन का तात्पर्य, जो कि आत्मा की अलेपकता बतलाना ही है, अन्य दृष्टान्तो द्…
- Verse 52समस्त देहो के भीतर स्थित होकर अन्तयमीरूप से उनका विधारक होने पर भी वह (आत्मा) अलक्ष्य ही…
- Verse 53वहाँ अधिष्ठानरूप से निर्विकार आत्मा की जो स्थिति है, वही ब्रह्मरूपताहै और वही त्रिकालाबाध…
- Verse 54इसलिए अनेकविध भ्रमोत्पादक अज्ञान से क्रमशः अहन्ता आदि तथा जगत्ता आदि से युक्त किंचित् स्…
- Verse 55चूँकि यह जगद्रूप आत्मा ही है, अतः "यह मारा जाता है" या “यह मारता है" इसमें विषय ही क्या ह…
- Verse 56अध्यस्त हुए वधादि दोषों से आत्मा लिप्त नहीं होता, इसमें दूसरा दृष्टान्त बतलाते हैं। प्रति…
- Verse 57मैं नहीं हूँ” - इस प्रकार का अर्थविभाग और शब्दविभाग जो मुझसे कहा जाता है, वह दर्पणस्वरूप…
- Verse 58अर्जुन, ये अहमभिमानवाले चित्त मेँ रहनेवाली सृष्टि-प्रलयात्मक सब तरह की क्रियाएँ वास्तव मे…
- Verse 59जिस प्रकार पर्वतं का पारमार्थिक स्वरूप पाषाणता ही है, वृक्षो का स्वरूप काष्ठता ही है ओर त…
- Verse 60सम्पूर्णं भूतो मे अधिष्ठानरूप से स्थित आत्मा को, उस आत्मा में अध्यस्तरूप से स्थित सम्पूर्…
- Verse 61हे अर्जुन, नाना प्रकार के आकारो एवं विकारों वाले तरंगों में जैसे जल अनुगत है या कटक आदि म…
- Verses 62–63जिस प्रकार जल में नाना प्रकार के चंचल तरंगसमूह रहते हैं या सुवर्ण मेँ कटक आदि रहते हैं, उ…
- Verse 64हे भारत, भूत आदि सम्पूर्णं पदार्थ ओर वृहद् ब्रह्म-इन सबको, दर्पण तथा उसमें के प्रतिबिम्ब…
- Verse 65इस प्रकार के उपदेशों को सुनकर ओर निश्चयपूर्वक भीतर अभय ब्रह्म की भलीर्भोति भावनाकर समचित्…
- Verse 66वक्ष्यमाण लक्षणों से युक्त उन जीवन्मुक्तो को विदेहमुक्ति भी प्राप्त होती है, इस आशय से कह…