Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
यथेहाहं तथेहास्ति घटादीहापि मर्कटः ।
स्वमीहैवं तथाम्भोधिः किमहंतां प्रति ग्रहः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ता के विषय में कहा गया न्याय घटादि विषयों में होनेवाले ममताभाव में भी लगाना चाहिए,
यह दिखलाते हुए तन्मूलभूत अहन्ताध्यास के त्याग को ही दृढ़ करते हैं ।
जैसे अहंभाव प्रत्यक्चैतन्य से पृथक् नहीं है, वैसे ही प्रत्यक् चेतन से घटादिविषयों में होनेवाला
ममताभावरूप बन्दर भी पृथक् नहीं है । ऐसी परिस्थिति में दोनों प्रकार के भाव, सागर के समान, पूर्ण
ब्रह्मरूप ही हैं; इसलिए अहन्ता के प्रति आग्रह ही क्या ? यानी अहन्ता का आग्रह युक्त नहीं है