Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
मन्ये साधुविबुद्धोसि पदे विश्रान्तवानसि ।
संकल्पैरवमुक्तोऽसि सत्यैकात्ममयो भव ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरे उपदेश के ज्ञान से तत्काल ही अपने स्वरूप में तुम्हें विश्रान्ति प्राप्त हो जायेगी, यों उत्साहवृद्धि
के लिए सिद्धवत् मानकर कहते हैं।
हे अर्जुन, मैं समझता हूँ कि मेरे उपदेश से तुम भली प्रकार प्रबुद्ध हो चुके हो, ब्रह्मपद में विश्रान्ति
पा चुके हो और सर्व-संकल्पों से भी मुक्त हो चुके हो । अब तुम सत्य एवं अद्वितीय आत्मस्वरूप होकर
स्थित रहो