Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।
सर्वसंकल्पसंशान्तौ प्रशान्तघनवासनम् ।
न किंचिद्भावनाकारं यत्तद्ब्रह्म परं विदुः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वपरिज्ञान के बिना आत्यन्तिक संगत्याग नहीं हो सकता, इसलिए भगवान् श्री कृष्णचन्द्रजी
लक्षण द्वारा पहले ब्रह्मात्मतत्त्व का ही निर्देश करते हैं।
श्रीभगवान् ने कहा : सब संकल्पों की (कामनाओं की) संशान्ति हो जाने पर सघनवासनाओं से
रहित, अतएव भावना करने योग्य कुछ भी रूप न रखनेवाला जो विशुद्ध चिन्मात्रतत्त्व है, वही परब्रह्म
कहा गया है