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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

बहुभिः समवायेन यत्कृतं तत्र भारत । एकोऽभिमानदुःखेन हास्यायैव हृइं गृह्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी जनसमुदाय द्वारा कोई एक कार्य किया गया हो, वहाँ पर उस समुदाय का हर एक पुरुष अपने में समुदायअभिमान कर यदि उस कार्य के विषय में जब शोक करता है तो उपहास्य हो जाता है, तब समुदाय में न रहनेवाला बाहर का कोई यदि उस विषय में शोक करे तो उसकी उपहास्यता में कहना ही क्या ? इस आशय से कहते हैं। हे भारत, बहुतों ने मिलकर एक साथ जिस कार्य का सम्पादन किया हो, उसमें यदि किसी एक को “मैंने ही किया है", यों अभिमानजन्य दुःख पकड़ लेता है तो वह हँसी के लिए ही होता है