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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

सर्वभूतस्थमात्मानं भजत्येकत्वमात्मनः । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो ब्रह्मज्ञ “सव वह ब्रह्म ही है" यों ऐक्य का आश्रय कर सम्पूर्ण भूतों में स्थित आत्मा को भजता है, वह सब प्रकार से यानी समाधिवृत्ति या व्यवहारवृत्ति से स्थित रहता हुआ भी पुनः इस संसार में उत्पन्न नहीं होता