Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 53, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
भावोऽहमिति कोऽप्येष प्रत्येकमुदितश्चितेः ।
कोटिकोट्यंशकलितः क इवैनं प्रति ग्रहः ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
संन्यास-वर्णन की उपपत्ति के लिए ब्रह्म मे जगदारोप के समान ही ब्रह्म के अंशभूत प्रत्येक जीव में
अहंभावाध्यास मानना युक्त है । इसलिए इस विषय में आग्रह करना ठीक नहीं जँचता, यह कहते हैँ ।
“मैं इस प्रकार का कोई एक अनिर्वचनीय भाव यानी अहंकाराध्यास प्रत्येक जीव में उत्पन्न हुआ
है, जो चिति के करोड़ों-करोड़ों अंशो से परिकल्पित है । इसके प्रति भला कौन-सा आग्रह ?